तकनीक बनाम भावनाएं: ‘सिलिकॉन वैली’ के गैजेट्स में इंसानी संवेदनाओं की कमी क्यों है?

Silicon Valley’s Empathy Deficit: Designing Tech for Real People

आज सुबह उठते ही सबसे पहले आपने क्या किया? शायद अपना स्मार्टफोन चेक किया होगा। हम एक ऐसी दुनिया में जी रहे हैं जहाँ हमारे दिन की शुरुआत स्क्रीन से होती है और रात भी उसी स्क्रीन की नीली रोशनी में खत्म होती है। अमेरिका की ‘सिलिकॉन वैली’ (Silicon Valley), जिसे दुनिया भर की तकनीक और इनोवेशन का मक्का कहा जाता है, ने हमें बेहतरीन गैजेट्स, शानदार ऐप्स और जादुई आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) दिए हैं। लेकिन इस चकाचौंध के पीछे एक बहुत गहरी और खामोश समस्या जन्म ले रही है।

क्या आपने कभी किसी बुजुर्ग को नया स्मार्टफोन इस्तेमाल करते हुए जूझते देखा है? या कभी महसूस किया है कि सोशल मीडिया का कोई ऐप आपको तनाव दे रहा है, फिर भी आप उसे बंद नहीं कर पा रहे हैं? अगर हाँ, तो आप उस समस्या का शिकार हैं जिसे टेक विशेषज्ञ ‘एम्पैथी डेफिसिट’ (Empathy Deficit) यानी ‘सहानुभूति या संवेदनाओं की कमी’ कहते हैं। आपकी मैगज़ीन के इस विशेष लेख में, हम यह समझने की कोशिश करेंगे कि अरबों डॉलर की टेक कंपनियां हमारे लिए उत्पाद बनाते समय ‘असली इंसानों’ की भावनाओं को क्यों भूल जाती हैं।


संवेदनाओं का सूखा: ‘एम्पैथी डेफिसिट’ का असली मतलब क्या है?

तकनीक की दुनिया में ‘एम्पैथी’ या सहानुभूति का मतलब सिर्फ किसी पर दया करना नहीं है। इसका सीधा सा अर्थ है—यूज़र (उपयोगकर्ता) के नज़रिए से दुनिया को देखना। जब कोई इंजीनियर कोई ऐप या गैजेट बनाता है, तो क्या वह यह सोचता है कि एक कम पढ़े-लिखे व्यक्ति, एक दृष्टिबाधित इंसान या किसी दूर-दराज़ के गांव में रहने वाले मज़दूर को इसे इस्तेमाल करने में क्या दिक्कतें आ सकती हैं?

दुर्भाग्य से, ज़्यादातर टेक कंपनियों में इसका जवाब ‘ना’ है। सिलिकॉन वैली में बैठे डेवलपर्स अक्सर उत्पाद अपने जैसे ही युवा, शहरी और तकनीक-प्रेमी लोगों को ध्यान में रखकर बनाते हैं। वे कोड लिखने में तो माहिर होते हैं, लेकिन इंसानी मनोविज्ञान और ज़मीनी हकीकत से उनका कोई वास्ता नहीं होता। इसी अंतर को ‘एम्पैथी डेफिसिट’ कहा जाता है, जहाँ मशीनें तो स्मार्ट हो रही हैं, लेकिन उन्हें बनाने वालों की सोच सीमित रह गई है।

मुनाफे की अंधी दौड़ और स्क्रीन से चिपकाए रखने की चाल

तकनीक में संवेदनाओं की कमी का सबसे बड़ा कारण है—मुनाफा और आंकड़े। आज इंटरनेट पर कोई भी चीज़ मुफ्त नहीं है; अगर आप पैसे नहीं दे रहे हैं, तो इसका मतलब है कि ‘आप ही वह प्रोडक्ट हैं’ जिसे बेचा जा रहा है। टेक कंपनियों का पूरा बिज़नेस मॉडल इस बात पर टिका है कि आप उनकी स्क्रीन पर कितना ज़्यादा वक्त बिताते हैं।

इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए, कंपनियों ने ऐसे ‘एल्गोरिदम’ (Algorithms) डिज़ाइन किए हैं जो हमारी मानवीय कमज़ोरियों का फायदा उठाते हैं:

  • इनफिनिट स्क्रॉल (Infinite Scroll): क्या आपने कभी गौर किया है कि इंस्टाग्राम या फेसबुक पर पेज कभी खत्म नहीं होता? आप नीचे स्क्रॉल करते जाते हैं और नया कंटेंट आता जाता है। इसे एक ‘स्लॉट मशीन’ (कसीनो के खेल) की तर्ज पर बनाया गया है, ताकि इंसान के दिमाग को लगातार ‘डोपामाइन’ (Dopamine – ख़ुशी का हार्मोन) मिलता रहे और वह घंटों स्क्रीन से चिपका रहे। यह डिज़ाइन मुनाफे के लिए तो बेहतरीन है, लेकिन इंसान के मानसिक स्वास्थ्य के प्रति इसमें रत्ती भर भी सहानुभूति नहीं है।

  • नेगेटिविटी को बढ़ावा: एल्गोरिदम को पता है कि इंसान सकारात्मक खबरों के बजाय डरावनी, भड़काऊ या नकारात्मक खबरों (Doomscrolling) पर ज़्यादा क्लिक करता है। इसलिए, ज़्यादा एंगेजमेंट के लालच में टेक कंपनियां यूज़र्स को तनावपूर्ण कंटेंट परोसती रहती हैं।

जब कोडिंग भेदभाव करने लगे: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और पक्षपात

‘एम्पैथी डेफिसिट’ का सबसे डरावना रूप तब सामने आता है जब तकनीक खुद भेदभाव करना शुरू कर देती है। हम सोचते हैं कि मशीनें निष्पक्ष होती हैं, लेकिन मशीनें वही सीखती हैं जो इंसान उन्हें सिखाते हैं।

  • रंगभेद और फेशियल रिकग्निशन: कई बार देखा गया है कि बड़ी कंपनियों के फेशियल रिकग्निशन (चेहरा पहचानने वाले) सॉफ्टवेयर गोरे लोगों के चेहरे तो तुरंत पहचान लेते हैं, लेकिन काले या सांवले रंग के लोगों के चेहरे पहचानने में गलती करते हैं। यहाँ तक कि ऑटोमैटिक साबुन के डिस्पेंसर (Soap Dispensers) तक डार्क स्किन वाले हाथों पर काम नहीं करते।

  • महिलाओं की अनदेखी: शुरुआती हेल्थ ट्रैकिंग ऐप्स में महिलाओं के मासिक धर्म (Menstrual Cycle) को ट्रैक करने का कोई विकल्प ही नहीं था, जबकि दुनिया की आधी आबादी महिलाएं हैं।

यह सब इसलिए होता है क्योंकि जो टीमें इन तकनीकों को बना रही हैं, उनमें विविधता (Diversity) नहीं है। जब कमरे में सिर्फ एक ही तरह के लोग बैठकर पूरी दुनिया के लिए कोई उत्पाद बनाएंगे, तो उसमें बाकी दुनिया की ज़रूरतें और संवेदनाएं छूट ही जाएंगी।

‘वन साइज़ फिट्स ऑल’ की ज़िद: अलग-अलग ज़रूरतों की अनदेखी

टेक कंपनियां अक्सर ‘औसत यूज़र’ (Average User) के लिए डिज़ाइन बनाती हैं। लेकिन हकीकत यह है कि कोई भी इंसान ‘औसत’ नहीं होता।

बुजुर्गों का ही उदाहरण लें। उम्र बढ़ने के साथ उंगलियों में कंपन आ जाता है, नज़र कमज़ोर हो जाती है और चीज़ों को याद रखने की क्षमता कम हो जाती है। लेकिन आधुनिक स्मार्टफोन्स में बटन इतने छोटे होते हैं, नेविगेशन इतना जटिल होता है और हर दूसरे दिन इंटरफेस बदल जाता है कि एक बुजुर्ग इंसान खुद को बेवकूफ और लाचार महसूस करने लगता है। तकनीक को उनकी मदद करनी चाहिए थी, लेकिन संवेदनाओं की कमी के कारण तकनीक ने उन्हें समाज से और काट दिया है। इसी तरह, दिव्यांगों (जैसे सुनने या देखने में अक्षम लोगों) के लिए ‘एक्सेसिबिलिटी’ (Accessibility) फीचर्स को अक्सर सबसे अंत में, सिर्फ एक औपचारिकता के तौर पर जोड़ा जाता है।

कोडिंग की दुनिया का ‘इको चैंबर’ और विशेषाधिकार

सिलिकॉन वैली और दुनिया के अन्य बड़े टेक हब एक तरह के ‘इको चैंबर’ (Echo Chamber) बन गए हैं। यहाँ लाखों डॉलर की सैलरी पाने वाले युवा काम करते हैं, जिनकी ज़िंदगी की समस्याएं आम आदमी से बहुत अलग हैं। उनके लिए सबसे बड़ी समस्या यह हो सकती है कि उनकी मनपसंद कॉफी सही समय पर कैसे डिलीवर हो, या उनके कुत्ते को घुमाने के लिए कोई ऐप कैसे बने।

जब वे इस विशेषाधिकार (Privilege) वाले बुलबुले में बैठकर भारत के किसी छोटे शहर या अफ्रीका के किसी गांव के लिए ऐप बनाते हैं, तो वे वहां की इंटरनेट स्पीड, भाषा की समस्या और सांस्कृतिक बारीकियों को समझ ही नहीं पाते। डिज़ाइन में संवेदना तभी आ सकती है जब बनाने वाला खुद यूज़र के दर्द को महसूस कर सके।

मानवीय तकनीक की ओर पहला कदम: ‘ह्यूमन-सेंटर्ड डिज़ाइन’

क्या इस समस्या का कोई समाधान है? जी हाँ, और इसका नाम है—’ह्यूमन-सेंटर्ड डिज़ाइन’ (Human-Centered Design) यानी ‘इंसान को केंद्र में रखकर बनाया गया डिज़ाइन’।

अब कुछ समझदार कंपनियां यह महसूस कर रही हैं कि सिर्फ अच्छे कोडर (Coder) रख लेना काफी नहीं है। अब टेक टीमों में मनोवैज्ञानिकों (Psychologists), समाजशास्त्रियों (Sociologists) और मानवविज्ञानियों (Anthropologists) को काम पर रखा जा रहा है। इनका काम सिर्फ यह देखना नहीं है कि ‘ऐप काम कर रहा है या नहीं’, बल्कि यह जाँचना है कि ‘ऐप इंसान की ज़िंदगी को कैसा बना रहा है’।

‘डिजिटल वेलबीइंग’ (Digital Wellbeing) जैसे फीचर्स—जो आपको बताते हैं कि आपने स्क्रीन पर कितना समय बिताया है और आपको ब्रेक लेने की याद दिलाते हैं—उसी सहानुभूति से भरे डिज़ाइन का एक छोटा सा हिस्सा हैं। जब माइक्रोसॉफ्ट (Microsoft) ने दिव्यांग गेमर्स के लिए विशेष ‘अडैप्टिव कंट्रोलर’ (Adaptive Controller) बनाया, तो उसने साबित कर दिया कि अगर नीयत में संवेदना हो, तो तकनीक सच में हर इंसान को सशक्त कर सकती है।

अंतिम विचार: तकनीक को इंसानियत का चोला पहनाना होगा

अंततः, तकनीक का मुख्य उद्देश्य मानव जाति की सेवा करना था, न कि हमें अपना गुलाम बनाना या हमारे अंदर हीन भावना पैदा करना। सिलिकॉन वैली को यह समझना होगा कि दुनिया में सिर्फ ‘यूज़र्स’ या ‘कंज्यूमर्स’ नहीं रहते, बल्कि यहाँ खून-मांस के बने इंसान रहते हैं, जिनकी अपनी भावनाएं, कमज़ोरियां और ज़रूरतें हैं।

जब तक टेक कंपनियां अपने डिज़ाइन प्रोसेस में ‘एम्पैथी’ यानी संवेदनाओं को सबसे ऊपर नहीं रखेंगी, तब तक वे चाहे जितने भी स्मार्ट गैजेट्स बना लें, वे इंसानियत के पैमाने पर हमेशा फेल ही रहेंगी। हमें ऐसी तकनीक की ज़रूरत है जो हमें समझे, न कि ऐसी जो सिर्फ हमारा फायदा उठाए।

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